Navigation Bar
- Dharamvir Bharti
- Gopaldas Neeraj
- Harishankar Parsai
- Harivansh Rai Bachchan
- Hazari Prasad Dwivedi
- Jaishankar Prasad
- Mahadevi Verma
- Maithili Sharan Gupta
- Makhanlal Chaturvedi
- Nagarjun
- Premchand
- Rahi Masoom Raza
- Ramdhari Singh Dinkar
- Sachchidananda Hirananda Vatsyayan
- Shivmangal Singh Suman
- Subhadra Kumari Chauhan
- Sumitra Nandan Pant
- Suryakant Tripathi
- Aadhar
- Alagyojha
- Bade Bhai Sahab
- Betowali Vidhwa
- Dhikkar
- Dil Ki Rani
- Ek Aanch Ki Kasar
- Gulli Danda
- Idgah
- Ishwari
- Istifa
- Jhanki
- Jyoti
- Kaptan Sahab
- Kaushal
- Maa
- Mamta
- Mantra
- Mata Ka Hriday
- Nairashay
- Nairashay Lila
- Narak Ka Marg
- Nasha
- Nirvasan
- Pariksha
- Prayashchit
- Pus Ki Raat
- Sabhyata Ka Rahasay
- Samasya
- Shanti
- Stri Aur Purush
- Swamini
- Swarg Ki Devi
- Tetar
- Thakur Ka Kua
- Uddhar
- Viswas
कौशल
==1==
पंडित बलराम शास्त्री की धर्मपत्नी माया को बहुत दिनों से एक हार की लालसा थी और वह
सैकडो ही बार पंडित जी से उसके लिए आग्रह कर चुकी थी, किन्तु पण्डित जी हीला-हवाला
करते रहते थे। यह तो साफ-साफ ने कहते थे कि मेरे पास रूपये नही है—इनसे उनके
पराक्रम में बट्टा लगता था—तर्कनाओं की शरण लिया करते थे। गहनों से कुछ लाभ नहीं एक
तो धातु अच्छी नहीं मिलती,श् उस पर सोनार रुपसे के आठ-आठ आने कर देता है और सबसे बडी
बात यह है कि घर में गहने रखना चोरो को नेवता देन है। घडी-भर श्रृगांर के लिए इतनी
विपत्ति सिर पर लेना मूर्खो का काम है। बेचारी माया तर्क –शास्त्र न पढी थी, इन
युक्तियों के सामने निरूत्तर हो जाती थी। पडोसिनो को देख-देख कर उसका जी ललचा करता
था, पर दुख किससे कहे। यदि पण्डित जी ज्यादा मेहनत करने के योग्य होते तो यह
मुश्किल आसान हो जाती । पर वे आलसी जीव थे, अधिकांश समय भोजन और विश्राम में व्यतित
किया करते थे। पत्नी जी की कटूक्तियां सुननी मंजूर थीं, लेकिन निद्रा की मात्रा में
कमी न कर सकते थे।
एक दिन पण्डित जी पाठशाला से आये तो देखा कि माया के गले में सोने का हार विराज रहा
है। हार की चमक से उसकी मुख-ज्योति चमक उठी थी। उन्होने उसे कभी इतनी सुन्दर न समझा
था। पूछा –यह हार किसका है?
माया बोली—पडोस में जो बाबूजी रहते हैं उन्ही की स्त्री का है। आज उनसे मिलने गयी
थी, यह हार देखा , बहुत पसंद आया। तुम्हें दिखाने के लिए पहन कर चली आई। बस, ऐसा ही
एक हार मुझे बनवा दो।
पण्डित—दूसरे की चीज नाहक मांग लायी। कहीं चोरी हो जाए तो हार तो बनवाना ही पडे,
उपर से बदनामी भी हो।
माया—मैंतो ऐसा ही हार लूगी। २० तोले का है।
पण्डित—फिर वही जिद।
माया—जब सभी पहनती हैं तो मै ही क्यों न पहनूं?
पण्डित—सब कुएं में गिर पडें तो तुम भी कुएं में गिर पडोगी। सोचो तो, इस वक्त इस
हार के बनवाने में ६०० रुपये लगेगे। अगर १ रु० प्रति सैकडा ब्याज रखलिया जाय ता –
वर्ष मे ६०० रू० के लगभग १००० रु० हो जायेगें। लेकिन ५ वर्ष में तुम्हारा हार
मुश्किल से ३०० रू० का रह जायेगा। इतना बडा नुकसान उठाकर हार पहनने से क्या सुख? सह
हार वापस कर दो , भोजन करो और आराम से पडी रहो। यह कहते हुए पण्डित जी बाहर चले गये।
रात को एकाएक माया ने शोर मचाकर कहा –चोर,चोर,हाय, घर में चोर , मुझे घसीटे लिए जाते
हैं।
पण्डित जी हकबका कर उठे और बोले –कहा, कहां? दौडो,दौडो।
माया—मेरी कोठारी में गया है। मैनें उसकी परछाईं देखी ।
पण्डित—लालटेन लाओं, जरा मेरी लकडी उठा लेना।
माया—मुझसे तो डर के उठा नहीं जाता।
कई आदमी बाहर से बोले—कहां है पण्डित जी, कोई सेंध पडी है क्या?
माया—नहीं,नहीं, खपरैल पर से उतरे हैं। मेरी नीदं खुली तो कोई मेरे ऊपर झुका हुआ
था। हाय रे, यह तो हार ही ले गया, पहने-पहने सो गई थी। मुए ने गले से निकाल लिया ।
हाय भगवान,
पण्डित—तुमने हार उतार क्यां न दिया था?
माया-मै क्या जानती थी कि आज ही यह मुसीबत सिर पडने वाली है, हाय भगवान्,
पण्डित—अब हाय-हाय करने से क्या होगा? अपने कर्मों को रोओ। इसीलिए कहा करता था कि
सब घडी बराबर नहीं जाती, न जाने कब क्या हो जाए। अब आयी समझ में मेरी बात, देखो, और
कुछ तो न ले गया?
पडोसी लालटेन लिए आ पहुंचे। घर में कोना –कोना देखा। करियां देखीं, छत पर चढकर देखा,
अगवाडे-पिछवाडे देखा, शौच गृह में झाका, कहीं चोर का पता न था।
एक पडोसी—किसी जानकार आदमी का काम है।
दूसरा पडोसी—बिना घर के भेदिये के कभी चोरी नहीं होती। और कुछ तो नहीं ले गया?
माया—और तो कुड नहीं गया। बरतन सब पडे हुए हैं। सन्दूक भी बन्द पडे है। निगोडे को
ले ही जाना था तो मेरी चीजें ले जाता । परायी चीज ठहरी। भगवान् उन्हें कौन मुंह
दिखाऊगी।
पण्डित—अब गहने का मजा मिल गया न?
माया—हाय, भगवान्, यह अपजस बदा था।
पण्डित—कितना समझा के हार गया, तुम न मानीं, न मानीं। बात की बात में ६००रू० निकल
गए, अब देखूं भगवान कैसे लाज रखते हैं।
माया—अभागे मेरे घर का एक-एक तिनका चुन ले जाते तो मुझे इतना दु:ख न होता। अभी
बेचारी ने नया ही बनावाया था।
पण्डित—खूब मालूम है, २० तोले का था?
माया—२० ही तोले को तो कहती थी?
पण्डित—बधिया बैठ गई और क्या?
माया—कह दूंगी घर में चोरी हो गयी। क्या लेगी? अब उनके लिए कोई चोरी थोडे ही करने
जायेगा।
पण्डित तुम्हारे घर से चीज गयी, तुम्हें देनी पडेगी। उन्हे इससे क्या प्रयोजन कि
चोर ले गया या तुमने उठाकर रख लिया। पतिययेगी ही नही।
माया –तो इतने रूपये कहां से आयेगे?
पण्डित—कहीं न कहीं से तो आयेंगे ही,नहीं तो लाज कैसे रहेगी: मगर की तुमने बडी भूल
।
माया—भगवान् से मंगनी की चीज भी न देखी गयी। मुझे काल ने घेरा था, नहीं तो इस घडी
भर गले में डाल लेने से ऐसा कौन-सा बडा सुख मिल गया? मै हूं ही अभागिनी।
पण्डित—अब पछताने और अपने को कोसने से क्या फायदा? चुप हो के बैठो, पडोसिन से कह
देना, घबराओं नहीं, तुम्हारी चीज जब तक लौटा न देंगें, तब तक हमें चैन न आयेगा।
==2==
पण्डित बालकराम को अब नित्य ही चिंता रहने लगी कि किसी तरह हार बने। यों अगर टाट
उलट देते तो कोई बात न थी । पडोसिन को सन्तोष ही करना पडता, ब्राह्मण से डाडं कौन
लेता , किन्तु पण्डित जी ब्राह्मणत्व के गौरव को इतने सस्ते दामों न बेचना चाहते
थे। आलस्य छोडंकर धनोपार्जन में दत्तचित्त हो गये।
छ: महीने तक उन्होने दिन को दिन और रात को रात नहीं जाना। दोपहर को सोना छोड दिया,
रात को भी बहुत देर तक जागते। पहले केवल एक पाठशाला में पढाया करते थे। इसके सिवा
वह ब्राह्मण के लिए खुले हुए एक सौ एक व्यवसायों में सभी को निंदनिय समझते थे। अब
पाठशाला से आकर संध्या एक जगह ‘भगवत्’ की कथा कहने जाते वहां से लौट कर ११-१२ बजे
रात तक जन्म कुंडलियां, वर्ष-फल आदि बनाया करते। प्रात:काल मन्दिर में ‘दुर्गा जी
का पाठ करते । माया पण्डित जी का अध्यवसाय देखकर कभी-कभी पछताती कि कहां से मैने यह
विपत्ति सिर पर लीं कहीं बीमार पड जायें तो लेने के देने पडे। उनका शरीर क्षीण होते
देखकर उसे अब यह चिनता व्यथित करने जगी। यहां तक कि पांच महीने गुजर गये।
एक दिन संध्या समय वह दिया-बत्ति करने जा रही थी कि पण्डित जी आये, जेब से पुडिया
निकाल कर उसके सामने फेंक दी और बोले—लो, आज तुम्हारे ऋण से मुक्त हो गया।
माया ने पुडिया खोली तो उसमें सोने का हार था, उसकी चमक-दमक, उसकी सुन्दर बनावट
देखकर उसके अन्त:स्थल में गुदगदी –सी होने लगी । मुख पर आन्नद की आभा दौड गई। उसने
कातर नेत्रों से देखकर पूछा—खुश हो कर दे रहे हो या नाराज होकर1.
पण्डित—इससे क्या मतलब? ऋण तो चुकाना ही पडेगा, चाहे खुशी हो या नाखुशी।
माया—यह ऋण नहीं है।
पण्डित—और क्या है, बदला सही।
माया—बदला भी नहीं है।
पण्डित फिर क्या है।
माया—तुम्हारी ..निशानी?
पण्डित—तो क्या ऋण के लिए कोई दूसरा हार बनवाना पडेगा?
माया—नहीं-नहीं, वह हार चारी नहीं गया था। मैनें झूठ-मूठ शोर मचाया था।
पण्डित—सच?
माया—हां, सच कहती हूं।
पण्डित—मेरी कसम?
माया—तुम्हारे चरण छूकर कहती हूं।
पण्डित—तो तमने मुझसे कौशल किया था?
माया-हां?
पण्डित—तुम्हे मालूम है, तुम्हारे कौशल का मुझे क्या मूल्य देना पडा।
माया—क्या ६०० रु० से ऊपर?
पण्डित—बहुत ऊपर? इसके लिए मुझे अपने आत्मस्वातंत्रय को बलिदान करना पडा।